रविवार, 16 जुलाई 2017

खुशियों का गाँव (बाल नाटक)-दृश्य -3 एवं 4

दृश्य-3 
(उसी पार्क का एक कोना।कोने में जमीन पर काली,दीनू,रामू,सलमा और मल्लिका गुमसुम से बैठे हैं।सभी के चेहरों पर उदासी।पार्क के दूसरे कोने में कुछ बच्चे खेलते हुए भी दिखाई पड़ते हैं।एक तरफ से एक बहुत बूढा,लम्बे बालों वाला थोडा सा डरावना व्यक्ति वहां पर आता है।वह छड़ी के सहारे धीरे-धीरे आकर उन बच्चों के पास वाली खाली बेंच पर बैठ जाता है।बच्चे उस बूढ़े को देख कर थोडा सहम से जाते हैं और धीरे धीरे दुसर तरफ खिसकने की कोशिश करते हैं।)
बूढा: (बच्चों से)अरे डरो मत बच्चो मै तुम्हारा कोई नुक्सान नहीं कर रहा।
रामू: पर आप हैं कौन बाबा ?
बूढा: (उदास स्वरों में)बस तुम्हारी ही तरह एक आदमी।तुम सब अभी बच्चे हो और मैं बूढा आदमी हूँ।वैसे सब मुझे भूतराजा भी कहते हैं।
(बूढ़ा व्यक्ति थोडा मुस्कराकर बच्चों को देखता है)
बूढा: पर एक बात बताओ ---तुम्हारी उम्र तो अभी खेलने कूदने की ---और तुम सब यहाँ कोने में  चुपचाप उदास क्यूँ बैठे हो?पार्क में उस तरफ देखो कितने बच्चे खेल रहे और तुम लोग यहाँ कोने में उदास बैठे?
दीनू: बाबा आपका नाम बड़ा अजीब है ---भूतराजा।
(उठकर बूढ़े के पैर देखने की कोशिश करता है।)
दीनू: (मुस्कराकर) आपके दोनों पैर तो सीधे हैं।
(दीनू की बात सुन कर भूतराजा बहुत तेज ठहाका लगाकर हँसता है)
भूतराजा : (हंसते हुए)तुम लोग भी बहुत मजाकिया हो।---बेटा मैं थोडा कुरूप हूँ नतो बचपन में सब मुझे भूत भूत कह कर चिढाते थे।बस फिर हमारा नाम ही भूतराजा हो गया।पर तुम लोग बताओ तुम सबके चेहरों पर बारह क्यूँ बज रहे?
रामू : बाबा पार्क में तो सब अमीर घरों के बिल्डिंगों में रहने वाले बच्चे ही खेलते हैं न।
भूताराजा : तो?
मल्लिका: वो सब हमें अपने साथ खिलाने को तैयार नहीं हैं।
भूतराजा : क्यूँ भला?
सलमा: क्योंकि हम सब गरीब और झोपड़पट्टी वाले बच्चे हैं।
मल्लिका: उनके माँ बाप पैसे वाले हमारे गरीब ।
सलमा: उनके घरों में ढेरों खुशियाँ ..हमारे पास दुखों के नाले ।
रामू: इसीलिये हम सब यहाँ बैठ कर सोच रहे कि हमें भी खुशियाँ कहाँ से मिलें?
दीनू: भूतराजा वो कौन सी जगह है जहाँ सिर्फ खुशियाँ हों?जहाँ हमें भी खेलने को मिले और कोई हमारे साथ खेले?
मल्लिका: भूतराजा आप क्या  हमें कोई ऎसी जगह बता सकते हैं जहां खुशियाँ बिकती हों?और हम वहां जाकर ढेर सारी खुशियाँ खरीद लायें?
भूतराजा : (कुछ सोचकर)मैं तो भैया ऐसी कोई जगह नहीं जानता।लेकिन एक परी को जानता हूँ---वो शायद तुम्हारा कुछ काम कर सकती हैं।
रामू: (चहककर)क्या वो हमें खुशियाँ खरीदवा सकती हैं?
भूतराजा : हाँ क्यूँ नहीं।
मल्लिका: भूतराजा फिर आप हमको उनके पास ले चलिए।
रामू: हाँ बाबा आप हमें चलकर उनसे मिलवा दीजिये न... ।
भूतराजा : (उठते हुए)ठीक है फिर चलो मेरे साथ।
(सारे बच्चे भूतराजा के साथ जाते हैं।आगे-आगे भूतराजा चलते हैं।उनके पीछे पीछे बच्चे ख़ुशी में गाते हुए चलते हैं।)
सलमा:               भूतराजा के संग हम सब
                    परी से मिलने जायेंगे
                    परी जी हमको देंगी खुशियाँ
                    हम खुशियाँ खरीद  के लायेंगे ।
(सारे बच्चे भूतराजा के साथ मंच पर घूमते हैं।धीरे धीरे दृश्य फेड आउट होता है।)
                                  दृश्य-(4)
(उसी पार्क एक किनारा।जहाँ खूब सारे फूल खिले हैं।वहीँ पर परी बनी एक लड़की अकेले डांस कर रही है।भूतराजा काली,दीनू,और मल्लिका सलमा के साथ वहां पहुंचते हैं।उन सबको देख कर परी नाचना बंद कर देती है।)
परी: अरे भूतराजा आप?और आपके साथ ये प्यारे-प्यारे बच्चे कौन हैं?
भूतराजा : बस परी रानी आज मुझे आपकी तरफ आने का बहाना मिल गया तो आ गया।
परी: मतलब?
भूतराजा : परी रानी ये प्यारे-प्यारे बच्चे बहुत उदास हैं और इन्हें खुशियों की तलाश है।तो मैंने सोचा एक आप ही हैं जो इन्हें खुशियाँ दे सकती हैं।
(परी आगे बढ़ कर आती है और काली,दीनू,सलमा,मल्लिका एक एक कर सभी के सर पर प्यार से हाथ फेरती है।)
भूतराजा : परी रानी अब आप इन्हें सम्हालें ---मैं चला ।
परी: ठीक है आप निश्चिन्त हो कर जाएँमैं इन्हें सम्हाल लूंगी।
(परी बच्चों के और करीब आ जाती है)
परी: पहले तो मैं तुम सभी के नाम जान लूँ क्या क्या हैं?
सलमा: दीदी मैं हूँ सलमा,ये है मल्लिका,और ये दीनू,रामू और ये काली।और हम सब पार्क के पीछे वाली झोपड़पट्टी में रहते हैं।
परी: अरे वाह बड़े अच्छे नाम हैं तुम सभी के।अब बताओ क्या दुःख है तुम सब को?
काली: परी रानी हम क्या बताएं?हमारे पास तो ढेरों दुःख हैं।
सलमा: तभी तो हम परेशान होकर आज खुशियाँ ढूँढ़ने निकले हैं ।
परी: अरे बाबा क्या दुःख है तुम सब को ---ज़रा मुझे भी तो बताओ।
सलमा: सबसे बड़ा दुःख तो यही है कि हम झोपड़पट्टी में रहते हैं।
काली: हमारे माँ-बाप मजदूरी करते हैं।
दीनू: हम नगरपालिका के स्कूलों में पढ़ते हैं।
मल्लिका: (दुखी स्वर में)और तो और हमारे माँ-बाप के पास पैसा नहीं है।
सलमा: (रुआंसी हो कर)दीदी इसी से पार्क में खेलने वाले दूसरे बच्चे हमें अपने साथ खिलाते नहीं।
काली: और तो और परी दीदी सब हमारा अच्छा ख़ासा नाम तक बिगाड़ देते हैं।मेरा नाम तो है काली प्रसाद पर सब मुझे कलुआ कह कर बुलाते हैं ।
सलमा: और मुझे सलमा की जगह सल्लू,मल्लिका को मल्लू ----।
परी: (दुखी स्वरों में)बस-बस मैं सब समझ गयी समझ गयी।
मल्लिका: अब आप ही बताएं दीदी हम कैसे खुश रहें?क्या आप हमें खुशियों की दूकान बता सकती हैं?जहां जाकर हम भी कुछ खुशियाँ खरीद सकें ?
(मल्लिका की बात सुनकर परी हंसने लगती है।बच्चे उन्हें आश्चर्य से देखते हैं।परी एकदम से चुप हो जाती है।)
परी: भला बताओ खुशियों की कोई दूकान होती है?
काली: फिर कहाँ से मिलेंगी हमें खुशियाँ दीदी?
परी: बच्चों खुशियाँ तो हमारे दिल में होती हैहम सभी के अन्दर---बस जरुरत है उन्हें बाहर निकालने की।
सलमा: (भोलेपन से)पर दीदी हमारे भीतर कहाँ हैं खुशियाँ?
परी: (कुछ सोचते हुए)मैं दूंगी तुम्हें खुशियाँ ----ढेर सारी खुशियाँ।
मल्लिका: (खुशी से उछल कर)सच दीदी ---आप हमें खुशियाँ देंगी?
परी: हाँ हाँ मैं दूंगी तुम्हे ढेर सारी खुशियाँ ---और तुम्हारे सारे दुखों को अपने पास समेट लूंगी।(सोचते हुए)---पर पहले चलो तुम सब मेरे साथ उस पेड़ की छाया में बैठ जाओ।
(परी के साथ सारे बच्चे सामने वाले पेड़ की छाँव में जाकर बैठते हैं।)
परी: हाँ अब ठीक है ----अब मैं तुम सबको एक खेल खिलाउंगी।बोलो कौन कौन
    खेलेगा?
(सारे बच्चे तुरंत उठ कर खड़े हो जाते हैं)
बच्चे: हम सब खेलेंगे आपके साथ...पर कौन सा खेल?
परी: देखो इस खेल में एक बच्चा यहाँ बीच में आँख बंद करके झाड़ू लगाने का दिखावा करते हुए घूमेगा।उसके चारों ओर हम सभी एक गाना गाते हुए घूमेंगे।बीच वाला बच्चा जिसे छू लेगा ...फिर वो बीच में झाडू लगते हुए घूमेगा-ठीक है शुरू करें?
बच्चे: हाँ दीदी।
(परी काली को गोल घेर के बीच खडा करती है।वो आँख बंद करके झाड़ू लगाने का अभिनय करता है।परी बाकी बच्चों के साथ उसके चरों और घूमती है ।
परी:    धूम धड़का हुआ तमाशा
        काली के घर बता बताशा ।
बच्चे:   धूम धड़का हुआ तमाशा
       काली के घर बटा बताशा ।
परी:    काली घर की करे सफाई
       हम सब खाएं खील बताशा ।
(परी और बच्चे नाचते हुए गाते रहते हैं।काली बीच में हँसता हुआ झाड़ू लगाता है।फिर वह आँख बंद किये हुए सलमा को छू लेता है।सभी बच्चे और परी चिल्लाते हैं।अब सलमा बीच में झाड़ू लगाती हुयी घूमती है।परी और दूसरे बच्चे नाचते गाते हैं।)
परी: धूम धड़का हुआ तमाशा
      सलमा के घर बटा बताशा
      सलमा घर की करे पुताई
      हम सब खाएं खील बताशा।
(सभी बच्चे हँसते हैं।परी भी खूब हंसती है।बच्चे रुक जाते हैं।)
दीनू: दीदीदीदी चलिए अब कोई दूसरा खेल खेलें?
परी: क्यों क्या ये खेल पसंद नहीं?
दीनू: (आँख को नचा कर)दीदी पसंद तो है लेकिन कोई दूसरा खेल खेलेंगे तो और मजा आएगा ।
परी: ठीक है चलो दूसरा खेल खेलेंगे हम सभी।बोलो कौन सा खेल?
सलमा: वो छुक छुक रेल वाला।
परी: अरे वाह चलो वही खेलते हैं।
(सारे बच्चे परी के पीछे रेल के डिब्बे बन कर खड़े होते हैं।परी इंजन बन जाती है।परी आगे आगे सीती बजाती हुयी दौड़ती है बच्चे उसके पीछे पीछे।परी एक गीत गाती है बच्चे उसे दुहराते हैं।)
परी:   छुक छुक करती दौड़ पड़ी,
      देखो ट्रेन  हमारी
      छोटे बड़े सभी को लेकर
      चलती रेल हमारी।
बच्चे: छुक छुक करती दौड़ पड़ी,
      अब देखो ट्रेन हमारी।
परी:   छोटे बड़े या नाटे मोटे
      सब करते इसमें सवारी
      नहीं किसी को मना ये करती
      ये ट्रेन सभी से न्यारी।
बच्चे:   छुक छुक करती दौड़ पड़ी,
       अब देखो ट्रेन हमारी
       ये ट्रेन सभी से न्यारी।
(सभी बच्चे परी के साथ गोल घेरे में रेलगाड़ी की तरह दौड़ते रहते हैं।उनका गीत धीमा होता जाता है।दृश्य परिवर्तन।)

4 टिप्‍पणियां:

  1. डॉ अरशद खान16 जुलाई 2017 को 11:04 am

    वाह, बहुत सुंदर नाटक। बधाई।

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "थोड़ा कहा ... बहुत समझना - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. रोचक प्रस्तुति के साथ बहुत अच्छा सन्देश

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